सत्संग



शास्त्रय् दसुऋग्वेदभाष्यम् प्रथममण्डले 51-60 सूक्तानि[१] भावार्थः—मनुष्यैर्न किल परमेश्वरेणाप्तेन पुरुषसङ्गेन वा विना सर्वेषां कामानां पूर्त्तिः कर्त्तुं शक्या तस्मादेतमेवोपास्य संगम्य वा कामपूर्त्तिः सम्पादनीयेति॥3॥ पदार्थः—हे (शचीवः) प्रशंसनीय प्रज्ञा, वाणी और कर्मयुक्त (द्युमत्तम) अतिशय करके सर्वज्ञता विद्याप्रकाशयुक्त (पुरुकृत्) बहुत सुखों के दाता (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त जगदीश्वर वा एैश्वर्य प्रापक सभापति विद्वान्! आपकी कृपा वा आप के सहाय से मनुष्य (अभितः) सब ओर से (इदम्) इस (वसु) उत्तम धन को (चेकिते) जानता है, हे (अभिभूते) शत्रुओं के पराजय करने वाले! जिस कारण आप (त्वायतः) आप वा उस के आत्मा की इच्छा करते हुए (जरितुः) स्तुति करने वाले धार्मिक भक्तजन की (कामम्) इष्टसिद्धि को (आभर) पूर्ण करें (अतः) इस पुरुषार्थ से आपको (संगृभ्य) ग्रहण करके मैं वर्त्तता हूं और आप मुझे सब कामों से पूर्ण कीजिये, आपकी इच्छा करते हुए स्तुति करने वाले मेरी इष्टसिद्धि को (मोनयीः) कभी क्षीण मत कीजिये॥3॥ भावार्थः—मनुष्यों को निश्चय करके परमेश्वर वा विद्वान् मनुष्य के… ऋग्वेदभाष्यम् प्रथममण्डले 71-80 सूक्तानि[२] भावार्थः—अत्रोपमालङ्कारः। नैव मनुष्यैः विद्वत्सङ्गेन विना सत्यविद्याबले सुखसौन्दर्य्याणि प्राप्तुं शक्यन्ते तस्मादेते नित्यं सेवनीयाः॥2॥ पदार्थः—हे मनुष्यो! तुम (यः) जो (सविता) सूर्य (देवः) दिव्य गुण के (न) समान (सत्यमन्मा) सत्य को जानने वा जनानेवाला विद्वान् (क्रत्वा) बुद्धि वा कर्म से (विश्वा) सब (वृजनानि) बलों की (निपाति) रक्षा करता है (पुरुप्रशस्तः) बहुतों में अति श्रेष्ठ (अमतिः) उत्तम स्वरूप के (न) समान (सत्यः) अविनाशिस्वरूप (दिधिषाय्यः) धारण वा पोषण करनेवाले (आत्मेव) आत्मा के समान (शेवः) सुखस्वरूप अध्यापक वा उपदेष्टा (भूत्) है, उसका सेवन करके विद्या की उन्नति करो॥2॥ भावार्थः—इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्य विद्वानों के सत्संग से सत्यविद्या, बल, सुख और सौन्दर्य आदि के प्राप्त होने को समर्थ हो सकते हैं, इससे इन दोनों का सेवन निरन्तर करें॥2॥ पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥ फिर भी विद्वान् कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥ गणेशपुराणम् — खण्डः २(क्रीडाखण्डम्) — अध्यायाः १४१-१४५[३] जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलैः सुसंवृतम् २१ अतिदुःखं च वैराग्यं भोगाद्वैतृष्ण्यमेव च । गुरुप्रसादः सत्संग उपायास्तज्यये अमी २२ अभ्यासाद्वा वशीकुर्यान्मनो योगस्य सिद्धये। वरेण्य दुर्लभो योगो विनाऽस्य मनसो जयात् २३ लक्ष्मीनारायणसंहिता — खण्डः ३ (द्वापरयुगसन्तानः) — अध्यायः ०३७[४] कुरुताऽपि च विश्रान्तिं निद्रां शुद्धिं च भोजनम् ।।3.37.६ ० ।। दैवं पैत्र्यं पुण्यकार्यं दानं कुरुत सेवनम् । सतां सेवां च सत्संगं धर्मं कुरुत सत्क्रियाम् ।।६ १।। दारान् पुत्रान् दुहितॄश्च पतिं सम्बन्धिबान्धवान् । पोषयत पशून् गाश्च पक्षिणो जन्तुदेहिनः ।।६२।। लिधंसा | |||||||||||||||||||||||||
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