शक्ति



शास्त्रय् दसु[सम्पादन]अग्निपुराणम् — अध्यायः ५९[१] अनिरुद्धः स च ब्रह्मा अप आदौ ससर्ज ह ॥५९.००८ तस्मिन् हिरण्मयञ्चाण्डं सोऽसृजत्पञ्चभूतवत् ।५९.००९ तस्मिन् सङ्क्रामिते जीवे[२](४) शक्तिरात्मोपसंहृता ॥५९.००९ प्राणो जीवेन संयुक्तो वृत्तिमानिति शब्द्यते ।५९.०१० जीवोव्याहृतिसञ्ज्ञस्तु प्राणेष्वाध्यात्मिकः स्मृतः ॥५९.०१० ऋग्वेदः सूक्तं १.१९१[३] कङ्कोपरि पौराणिकसंदर्भाः एवं संक्षिप्त टिप्पणी सतीनकङ्कतम् शब्दस्य एका व्याख्या डा. तोमरस्य शोधप्रबन्धे कृतमस्ति - सती सच्चिदानन्द परमात्मा की वह शक्ति है, जो सत् और असत् के द्..वन्द्व से परे है। उसी शक्ति का स्वामी होने वाला प्राणोदक सतीन समझा जाना चाहिए। अन्या संभावित व्याख्या शतिनं शब्दोपरि आधृता संभवमस्ति। वैदिकवाङमये दशतः विभाजनं ऋग्वेदे भवति, शततः यजुर्वेदे एवं सहस्रतः सामवेदे। १.१९१.१० दृतिं सुरावतो गृहे। ऋग्वेदः सूक्तं १०.१०८[४] सरमा उपरि टिप्पणी (दर्पणं) सरमा शब्द के मूल में वही "सृ” धातु है जो सरस्वती तथा सरण्यू में देखी जा चुकी है। अतः सरमा को भी सरस्वती एवं सरण्यू के समान वाक् नामक शक्ति का द्योतक माना गया है। - सरमाशब्दस्य विवेचनम् सरमा सरणात् ।- निरुक्तशास्त्रम् ११.२५ ऋग्वेदः सूक्तं १०.११७[५] समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते. यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः.. (९) हमारे समान रूप वाले दोनों हाथों की धारण शक्ति समान नहीं है. एक ही माता से उत्पन्न गाएं बराबर दूध नहीं देती. जुड़वां भाइयों का पराक्रम एक जैसा नहीं होता. एक परिवार में जन्म लेने वाले दो व्यक्ति बराबर दान नहीं करते. (९) </poem> }} लिधंसा[सम्पादन]
| |||||||||||||||||||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|