प्रकार
Appearance
| प्रकार | |
| मू भाय् | संस्कृत |
प्रकार छगु संस्कृत भाषायागु खँग्वः खः। थ्व खँग्वःयागु छ्येलेज्या येक्व सफू व स्तोत्रय् जुगु दु।
खँग्वःयागु उत्पत्ति व छ्येलेज्या
[सम्पादन]उत्पत्ति व विकास
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या दक्ले न्ह्य संस्कृतय् जुगु ख। लिपा थ्व खँग्वयागु तत्सम खँग्वया रुपे यक्व भासे, यक्व कथलं छ्येलेज्या जुल।
छ्येलेज्या
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या संस्कृतय् व संस्कृत नाप स्वापू दुगु व संस्कृत नं बुया वगु भाषे जुगु खने दु।
- दसु — पदार्थः— मैं जिस [अनिशितः] अतिविस्तृत [सपत्नक्षित्] शत्रुओं के नाश करने वाले संग्राम से (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और जिससे (प्रत्युष्टा अरातयः) सत्यविरोधी अच्छी प्रकार दाहरूप दण्ड को प्राप्त (असि) होते हैं, वा जिस बन्धन से (निष्टप्तं रक्षः) बांधने योग्य (निष्टप्ता अरातयः) विद्या के विघ्न करने वाले निरन्तर संताप को प्राप्त होते हैं, (त्वा) उस (वाजिनम्) वेग आदि गुण वाले संग्राम को (वाजेध्यायै) जो कि अन्न आदि पदार्थों से बलवान् करने के योग्य सेना है, उसके लिये युद्ध के साधनों को (संमार्ज्मि) अच्छी प्रकार शुद्ध करता हूँ, अर्थात् उनके दोषों का विनाश करता हूँ और मैं जिस (सपत्नक्षित्) शत्रु का नाश करने वाले और (अनिशिता) अति विस्तारयुक्त सेना से (प्रत्युष्टं रक्षः) परसुख का न सहने वाला मनुष्य वा (प्रत्युष्टा अरातयः) उक्त अवगुणवाले अनेक मनुष्य (निष्टप्तं रक्षः) जुआ खेलने और परस्त्रीगमन करने तथा (निष्टप्ता अरातयः) औरों को सब प्रकार से दुःख देने वाले मनुष्य अच्छी प्रकार निकाले जाते हैं, (त्वा) उस (वाजिनीम्) बल और वेग आदि गुणवाली सेना को (वाजेध्यायै) बहुत साधनों से प्रकाशित करने के लिये (संमार्ज्मि) अच्छी प्रकार उत्तम-उत्तम शिक्षाओं से शुद्ध करता हूँ। [१]
- दसु — और जो कि (अनिशितः) बड़ी क्रियाओं से सिद्ध होने योग्य वा (सपत्नक्षित्) दोषों वा शत्रुओं के विनाश करनेहारे (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और (प्रत्युष्टा अरातयः) जिसमें सत्यविरोधी अच्छी प्रकार दाहरूप दण्ड को प्राप्त (असि) होते हैं, वा (निष्टप्तं रक्षः) जिस बन्धन से बांधने योग्य (निष्टप्ता अरातयः) विद्या के विघ्न करने वाले निरन्तर सन्ताप को प्राप्त होते हैं (त्वा) उस (वाजिनम्) यज्ञ को (वाजेध्यायै) अन्न आदि पदार्थों के प्रकाशित होने के लिये (संमार्ज्मि) शुद्धता से सिद्ध करता हूँ [इस प्रकार जिस (सपत्नक्षित्) शत्रुओं का नाश करने वाली (अनिशिता) अतिविस्तारयुक्त क्रिया से (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और (प्रत्युष्टा अरातयः) दुर्गुण तथा नीच मनुष्य नष्ट होते हैं, (निष्टप्तं रक्षः) काम, क्रोध आदि राक्षसी भाव दूर होते हैं, (निष्टप्ता अरातयः) जिसमें दुःख तथा दुर्गन्ध आदि दोष नष्ट [(असि)] होते हैं, (त्वा) उस (वाजिनीम्) सत्क्रिया को (वाजेध्यायै) अन्न आदि पदार्थों के प्रकाशित होने के लिये (सम्मार्ज्मि) भली प्रकार सिद्ध करता हूँ। [२]
- दसु — इसी प्रकार आप भी इस यज्ञ तथा सत्क्रिया को पवित्रतापूर्वक सिद्ध करो] यह दूसरा अर्थ हुआ। [३]
- दसु — <p style="text-align: justify;"><strong>पदार्थः— </strong>हे (अग्ने) परमेश्वर! (ते) आपकी जो (एषा) यह (समित्) अच्छी प्रकार पदार्थों के गुणों की प्रकाश करने वाली वेदविद्या है, (<span>तया) उससे हम लोगों की की हुई स्तुति को प्राप्त होकर आप नित्य (वर्धस्व) हमारे ज्ञान में वृद्धि को प्राप्त हूजिये</span>, (<span>च) और उस वेदविद्या से हम लोगों की भी नित्य वृद्धि कीजिये। [४]
- दसु — इसी प्रकार हे भगवन्! आप के गुणों को जाननेहारे हम लोगों से (च) भी प्रकाशित होकर आप (प्यायस्व) हमारे आत्माओं में वृद्धि को प्राप्त हूजिये। [५]
मेमेगु भाषे छ्येलिगु रुप
[सम्पादन]मेमेगु भाषे थ्व खँग्वयात छ्येलिगु रुप थ्व कथलं दु
- नेपाल भाषा :
- पालि :
- हिन्दी :
- खेँ भाषा :
- बांग्ला भाषा :
- मराठी भाषा :
- भोजपुरी भाषा :
- उडिया भाषा :
- गुजराती भाषा :
- मणिपुरी भाषा :
- रोमानी भाषा :
- पञ्जाबी भाषा :
- आसामी भाषा :
- मैथिली भाषा :
- द्रविड भाषात :
- मेमेगु भाषा:
स्वया दिसँ
[सम्पादन]पिनेयागु स्वापू
[सम्पादन]संस्कृत खँग्वसफू
(थ्व भाषा नाप स्वापू दुगु चीहाकगु च्वसु खः। थ्व च्वसुय् अप्व तथ्य तनादीत ईनाप दु।)
लिधंसा
[सम्पादन]- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः २९
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः २९
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः २९
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः २/मन्त्रः १४
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः २/मन्त्रः १४