पुनर्वसु
पुनर्वसु वेदकथं मनुयागु वंशजयाम्ह छम्ह हिन्दू पात्र खः। थ्व छगू नक्षत्रया नां नं ख।
स्वयादिसँ
[सम्पादन]शास्त्रय् दसु
[सम्पादन]अग्निपुराणम् — अध्यायः १३६[१] |+ त्रिनाडीचक्रम्(नारदपु., १.५६.५०९?) |- | १|| अश्विनी || आर्द्रा || पुनर्वसु || उत्तराफाल्गुनी || हस्त || ज्येष्ठा|| मूल || शतभिषा|| पूर्वाभाद्रपदा |- | २|| भरणी || मृगशिरा || पुष्य||पूर्वाफाल्गुनी || चित्रा || अनुराधा||पूर्वाषाढा|| धनिष्ठा|| उत्तराभाद्रपदा
अग्निपुराणम् — अध्यायः २९३[२] | का|| १|| आर्द्रा|| ऐ |- | रा|| २|| पुनर्वसु|| ओ औ |- | य|| १|| पुष्य|| क
अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् — चतुर्थः अध्यायः[३] [४|३|३३] अणञौच - सिन्धु तथा अपकार शब्दों से जात अर्थ में क्रमशः अण् तथा अञ् प्रत्यय होता है। | सिन्धु + अण् == सैन्धवः ; अपकर + अञ् == आपकरः। [४|३|३४] श्रविष्ठा-फल्गुन्यनुराधा-स्वाति-तिष्य-पुनर्वसु-हस्त-विशाखाऽषाढाबहुलाल्लुक् - नक्षत्रार्थ श्रविष्ठा, फल्गुनी, अनुराधा, स्वाति, तिष्य, पुनर्वसु, हस्त, विशाख, आषाढ तथा बहुल शब्दों से विहित जातार्थक प्रत्यय का लोप। | श्रविष्ठा + अण् == श्रविष्ठः, फल्गुनी + अण् == फल्गुनः, अनुराधा + अण् == अनुराधः इसी प्रकार स्वातिः, तिष्यः, पुनर्वसुः, हस्तः, विशाखः, अषाढः, बहुलः। [४|३|३५] स्थानान्त-गोशाल-खरशालाच्च - स्थानशब्दान्त, गोशाल तथा खरशाल शब्दों से भी जात अर्थ में विहित् प्रत्यय का लोप। | गोस्थाने जातः = गोस्थानः, अश्वस्थानः, गोशालः, खरशालः।
अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् — प्रथमः अध्यायः[४] [१|२|६०] फल्गुनीप्रोष्ठपदानांचनक्षत्रे फाल्गुनी-द्वय तथा प्रोष्ठपद - द्वय के द्वित्व के स्थान में विकल्प से बहुवचन होता है। | उदिताः पूर्वाः फल्गुन्यः (अत्र बहुवचनम्), उदिते पूर्वे फल्गुन्यौ (अत्र द्विवचनम्)। उदिताः पूर्वाः प्रोष्ठपदाः, उदिते पूर्वे प्रोष्ठपदे। [१|२|६१] छन्दसिपुनर्वस्वोरेकवचनम् वैदिकस्थल में पुनर्वसु के द्विवचन के स्थान में विकल्प से एकवचन भी होता है। | पुनर्वसुर्नक्षत्रम् (अत्रैकवचनम्), पुनर्वसू नक्षत्रे (अत्र द्विवचनम्)। [१|२|६२] विशाखयोश्र्च विशाखा नक्षत्र के द्विवचन के स्थान में भी वेद में विकल्प से एकवचन होता है। | विशाखा नक्षत्रम्, विशाखे नक्षत्रे।