उशनस्
शास्त्रय् दसु
[सम्पादन]अनुक्रमणिका[१]
- काव्य,1/3/25/1/3,पुं/
- उशनस्,1/3/25/1/4,पुं/
- भार्गव,1/3/25/1/5,पुं/
अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् — सप्तमः अध्यायः[२] [७|१|९३] अनङ् सौ सम्बुद्धि भिन्न "सु" (१_१) परे रहते सखि पदान्त को अनँङ् आदेश। अनँङ् में " अङ्" इतसंज्ञक है व केवल " अन्" शेष। | सखायौ, सखायः, सखायम्, सखायौ। [७|१|९४] ऋदुशनस्-पुरुदंसोऽनेहसां च ऋकारान्त, उशनस् (शुक्राचार्य), पुरुदन्सस् (बिल्ली, विडाल) व अनेहस् (समय) शब्दों को सम्बुद्धि भिन्न "सु" परे रहते " अनङ्" आदेश । " अनङ्" में "ङ्" इत्संज्ञक होने से केवल " अन्" शेष। | क्रोष्टृ + स् ==> क्रोष्टृ + अन् + स् [७|१|९५] तृज्वत् क्रोष्टुः सम्बुद्धि भिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर क्रोष्टु शब्द के स्थान पर ऋकारान्त कोष्टृ शब्द होता है। | क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रॊष्टारः, क्रॊष्टारम्, क्रॊष्टारौ।
कल्किपुराणम् — अध्यायः ३१[३] अवगाह्य सरोनीरं सोमं हरम् अपश्यत))4 सा सखीभिः परिवृता देवयान्या च संगता) (Nं of a daughter of उशनस् or शुक्राचार्य (wife of ययाति and mother of यदु and तुर्वसु) शम्भु-भीत्या समुत्थाय पर्यधाद् वसनं द्रुतम्))5
कल्किपुराणम् — तृतीय अंशः[४] अवगाह्य सरोनीरं सोमं हरम् अपश्यत))4 सा सखीभिः परिवृता देवयान्या च संगता) (Nं of a daughter of उशनस् or शुक्राचार्य (wife of ययाति and mother of यदु and तुर्वसु) शम्भु-भीत्या समुत्थाय पर्यधाद् वसनं द्रुतम्))5