इक्ष्वाकु
शास्त्रय् दसु
[सम्पादन]अनुक्रमणिका[१]
- कर्कटी,2/4/155/2/4,स्त्री/
- इक्ष्वाकु,2/4/156/1/1,स्त्री/
- कटुतुम्बी,2/4/156/1/2,स्त्री/
अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् — द्वितीयः अध्यायः[२] [२|४|६१] न तौल्वलिभ्यः तौल्वलि आदि से विहित युवप्रत्यय का लोप नहीं होता। | तौल्वलिः पिता, तौल्वलायनः पुत्रः। [२|४|६२] तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम् - स्त्रीलिंग को छोड़कर अन्य लिंग (पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग) में बहुत्व अर्थ में तद्राज प्रत्यय का लोप होता है। | इक्ष्वाकु शब्द से राजा या अपत्य अर्थ में अञ् प्रत्यय हो अजादि-वृद्धि आदि होकर ऐक्ष्वाकव रूप बनता है।यहाँ बहुवचन की विविक्षा में प्रकृत सूत्र से तद्राज प्रत्यय अञ् का लोप हो जाता है। [२|४|६३] यस्कादिभ्यो गोत्रे - `यरकऄ आदि से पहले बहुत्वार्थक गोत्रप्रत्ययों का लोप होता है, स्त्रीलिंग को छोड़कर यदि यह बहुत्व उसी गोत्रप्रत्यय से जन्य हो। | यस्काः (यास्कः, यास्कौ, यस्काः)। लभ्याः (लाभ्याः, लाभ्योः, लभ्याः)
भेलसंहिता शारीरस्थानम् (भिन्नपाठः)[३]
४.२२। प्रदीप्यते नृणां कोष्ठे सति वेन्धनपूरितः।
इक्ष्वाकु-*कोशम्[*शोक]-आस्थाय यथा दीपः स्थिरेऽम्भसि॥
४.२३। तिष्ठते तिमिरे सक्तो न तथा चलितेऽम्भसि।
मत्स्यपुराणम् — अध्यायः १२[४] सूत उवाच। अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः। इक्ष्वाकु प्रमुखा जग्मु स्तदाशरवणान्तिकम्।। १२.१ ।। ततस्ते दद्रृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।