संस्कृत
| संस्कृत | ||
|---|---|---|
| खंल्हाइगु थाय: | — | |
| थाय: | — | |
| ल्याखं (छ्येलिपिंगु): | — | |
| भाषा परिवार: | इण्डोइरानियन् कच्चा इण्डोआर्यन् उप-कच्चा संस्कृत |
|
| भाषा कोड | ||
| आइ एस ओ ६३९-१: | sa | |
| आइ एस ओ ६३९-२: | san | |
| आइ एस ओ ६३९-३: | san | |
| नोट: थ्व पौय् IPA फोनेटिक आख: युनिकोडय् दे फु| | ||
संस्कृत हलिमयागु दक्ले पुलांगु व विकशित भाय् य् छगु खः। थ्व भाय् इण्डोयोरोपियन् भाय् परिवार यागु इण्डोआर्यन् कच्चाय् ला:। थ्व भाय् हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म व जैन धर्म यागू धार्मिक भाय् ख:। थौं कन्हय् थ्व भाय् भारत यागू २२ राष्ट्रीय भाषातेत मान्यता बियातगु दु व भारत यागू उत्तराखण्डय् च्वङ्गू छगू मू भय् ख:।
संस्कृत भाषां च्वयात:गु:-
सङ्गीतम् इत्येषा कला शब्दैः नादैः शक्त्या च सञ्चाल्यमाना सहजा क्रिया । भावः लयः मेलनं माधुर्यं च उत्तमसङ्गीतस्य मूलन्यासाः भवन्ति । सङ्गीतं मनसि उद्भूयमाना सहजा क्रिया । अतः केनापि नादेन विना अपि मनसि एव सङ्गीतस्य अनुभूतिं कर्तुं समर्थाः मानवाः । यदा एषा क्रिया शास्त्रीशैल्या वाद्यपरिकरैः विशेषकौशलेन प्रदर्शिता भवति तस्याः सङ्गीतकला इति व्यवहारः । सङ्गीतस्य मूलं वेदाः एव । ऋग्वेदादिषु मन्त्राः सस्वराः एव । सङ्गीतं तु स्वरेणनिबद्धम् एव । गानं तु मानवस्य भाषणम् इव स्वाभाविकं भवति । अतः मानवः कदारभ्य गातुम् आरब्धवान् इति निर्णयः दुस्साध्यः एव । किन्तु बहोः कालात् अनन्तरम् अस्य व्यवस्थितं रूपं प्राप्तम् अस्ति । यदा स्वरस्य लयस्य च व्यवस्थितं धारणं भवति तदा कलायाः प्रादुर्भावः भवति ।
धलः |
संस्कृत आख: [सम्पादन]
मा आख: [सम्पादन]
| आख: | प् | आइ पि ए(IPA) | !) |
|---|---|---|---|
| अ | प | /ɐ/ or /ə/ | |
| आ | पा | /ɑː/ ) | |
| इ | पि | /i/ | |
| ई | पी | /iː/ | |
| उ | पु | /u/ | |
| ऊ | पू | /uː/ | |
| ऋ | पृ | /r̩/ | |
| ॠ | पॄ | /r̩ː/ | |
| ऌ | पॢ | /l̩/ | |
| ॡ | पॣ | /l̩ː/ | |
| ए | पे | /eː/ | |
| ऐ | पै | /əi/ | |
| ओ | पो | /oː/ | |
| औ | पौ | /əu/ |
संस्कृत ग्रन्थ व ग्रन्थकार [सम्पादन]
[अभिषेक नाटक]] - भास
चारुदत्त भास
प्रतिमानाटकम् भास
ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त - ब्रह्मगुप्त
मध्यमव्यायोग भास
व्याकरणमहाभाष्य - पतंजलि
साहित्य दर्पण - विश्वनाथ कविराज
स्वयादिसँ [सम्पादन]