हस्तिन्
शास्त्रय् दसु
[सम्पादन]अनुक्रमणिका[१]
- दन्तावल,2/8/34/1/2,पुं/
- हस्तिन्,2/8/34/1/3,पुं/
- द्विरद,2/8/34/1/4,पुं/
अष्टाध्यायी-गणपाठः[२] उपमितंव्याघ्रादिभिःसामान्याप्रयोगे (२.१.५६) व्याघ्र। सिंह। ऋक्ष। ऋषभ। चन्दन। वृक्ष। वराह। वृष। हस्तिन्। कुञ्जर। रुरु। पृषत। पुण्डरीक। बलाहक। अकृतिगनश्चअयम्, तेनइदम्अपिभवतिमुखपद्मम्, मुखकमलम्, करकिसलयम्, पार्थिवचन्द्रःइत्येवम्आदि। 11. श्रेण्यादिः श्रेण्यादयःकृतादिभिः (२.१.५९)
अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् — चतुर्थः अध्यायः[३] [४|४|७] नौद्वयचष्ठ्न - नौ तथा द्वयच् प्रातिपादिक से `तरतॎ अर्थ में ठन् प्रत्यय होता है। | नावा तरति = नाविकः। द्वयचः - घटेन तरति = घटिकः, बाहुकः। [४|४|८] चरति - चरति (चलता है और खाता है) अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपादिक से ठक् प्रत्यय होता है। | हस्तिना चरति (हाथी द्वारा चलता है) - यहाँ चलता है अर्थ में तृतीयान्त हस्तिना से ठक् प्रत्यय हो हस्तिना ठ रूप बनता है। तब सुप्-लोप हो हस्तिन् उ रूप बनने पर इकादेश, टि-लोप और अजादि-वृद्धि आदि होकर प्रथमा के एकवचन-पुँल्लिङ्ग में हास्तिकः रूप सिद्ध होता है। [४|४|९] आकर्षात्ष्ठल् - आकर्षक शब्द से `चरतॎ अर्थ में ष्ठल् प्रत्यय होता है। | आकर्षेण चरति = आकर्षिकः आकर्षिकी।
अष्टाध्यायी हिन्दी व्याख्या सहितम् — तृतीयः अध्यायः[४] [३|२|५३] अमनुष्य-कर्तृके च - अमनुष्यकर्त्तक अर्थ में वर्तमान `हन् ` धातु से कर्म के उपपद होने पर टक् प्रत्यय होता है। | श्लेष्मघ्नं मधु (कफ को नष्ट करनेवाला मधु), पित्तघ्नं घृतम् (पित्त को मारनेवाला घी)। [३|२|५४] शक्तौ हस्ति-कपाटयोः - कर्मत्वविषिष्ट हस्तिन् तथा कपाट के उपपदत्व में `हन् ` धातु से शक्ति के गम्यमान होने पर `टक् ` प्रत्यय होता है। | हस्तिनं हन्तुं शक्नोति == हस्तिध्नो मनुष्यः (हाथी को मार सकनेवाला मनुष्य)। कपाटं हन्तुं शक्नोति == कपाटघ्नश्चौरः (किवाड़ तोड़ने में समर्थ चोर) [३|२|५५] पाणिघताडघौ शिल्पिनि - कर्मत्वविषिष्ट पाणि तथा ताड शब्दों के उपपदत्व में `हन् ` धातु से क प्रत्यय `हन् ` धातु के टि का लोप तथा घत्व का निपातन है। | पाणि + ङस् + हन् + क == पाणिघः, इसी प्रकार ताडघः ।