स्तुति
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| स्तुति | |
| मू भाय् | संस्कृत |
स्तुति छगु संस्कृत भाषायागु खँग्वः खः। थ्व खँग्वःयागु छ्येलेज्या येक्व सफू व स्तोत्रय् जुगु दु।
खँग्वःयागु उत्पत्ति व छ्येलेज्या
[सम्पादन]उत्पत्ति व विकास
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या दक्ले न्ह्य संस्कृतय् जुगु ख। लिपा थ्व खँग्वयागु तत्सम खँग्वया रुपे यक्व भासे, यक्व कथलं छ्येलेज्या जुल।
छ्येलेज्या
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या संस्कृतय् व संस्कृत नाप स्वापू दुगु व संस्कृत नं बुया वगु भाषे जुगु खने दु।
- दसु — पदार्थः— हे परमेश्वर! आप (धूः) सब दोषों के नाश और जगत् की रक्षा करने वाले (असि) हैं, इस कारण हम लोग इस बुद्धि से (देवानाम्) विद्वानों को विद्या मोक्ष और सुख में (वह्नितमम्) यथायोग्य पहुंचाने (सस्नितमम्) अतिशय कर के शुद्ध करने (पप्रितमम्) सब विद्या और आनन्द से संसार को पूर्ण करने (जुष्टतमम्) धार्मिक भक्तजनों के सेवा करने योग्य और (देवहूतमम्) विद्वानों की स्तुति करने योग्य आप की नित्य उपासना करते हैं। [१]
- दसु — हे शिल्पविद्या को जानने की इच्छा करने वाले मनुष्य! तू जो भौतिक अग्नि (धूः) सब पदार्थों का छेदन और अन्धकार का नाश करने वाला (असि) है तथा जो कला चलाने की चतुराई से यानों में विद्वानों को (वह्नितमम्) सुख पहुंचाने (सस्नितमम्) शुद्धि होने का हेतु (पप्रितमम्) शिल्पविद्या का मुख्य साधन (जुष्टतमम्) कारीगर लोग जिस का सेवन करते हैं तथा जो (देवहूतमम्) विद्वानों को स्तुति करने योग्य अग्नि है, उस को (वयम्) हम लोग (धूर्वामः) ताड़ते हैं और जिसका सेवन युक्ति से न किया जाय तो (अस्मान्) हम लोगों को (धूर्वति) पीड़ा करता है, (तम्) उस (धूर्वन्तम्) पीड़ा करने वाले अग्नि को (धूर्व) यानादिकों में युक्त कर तथा हे वीर पुरुष! तुम (यः) जो दुष्ट शत्रु (अस्मान्) हम लोगों को (धूर्वति) दुःख देता है (तम्) उस को (धूर्व) नष्ट कर तथा जो कोई चोर आदि है, उसका भी (धूर्व) नाश कीजिये। [२]
- दसु — भावार्थः— जो ईश्वर सब जगत् को धारण कर रहा है, वह पापी दुष्ट जीवों को उन के किये हुए पापों के अनुकूल दण्ड देकर दुःखयुक्त और धर्मात्मा पुरुषों को उत्तम कर्मों के अनुसार फल देके उन की रक्षा करता है, वही सब सुखों की प्राप्ति, आत्मा की शुद्धि कराने और पूर्ण विद्या का देने वाला, विद्वानों के स्तुति करने योग्य तथा प्रीति और इष्ट बुद्धि से सेवा करने योग्य है, दूसरा कोई नहीं। [३]
- दसु — <p style="text-align: justify;"><strong>पदार्थः— </strong>विद्वान् लोगों ने जिस (गन्धर्वः) पृथिवी वा वाणी के धारण करने वाले (विश्वावसुः) विश्व को बसाने वाले [(परिधिः) सब ओर से सब वस्तुओं को धारण करने वाले] (इडः) स्तुति करने योग्य (अग्निः) सूर्य्यरूप अग्नि की (ईडितः) स्तुति (असि) की है, <span>जो (विश्वस्य) संसार के वा विशेष करके (यजमानस्य) यज्ञ करने वाले विद्वान् के (अरिष्ट्यै) दुःखनिवारण से सुख के लिये इस यज्ञ को (परिदधातु) धारण करता है</span>, <span>इससे विद्वान् [त्वा] उसको विद्या की सिद्धि के लिये (परिदधातु) धारण करे और विद्वानों से जो वायु (इन्द्रस्य) सूर्य्य का (बाहुः) बल और (दक्षिणः) वर्षा की प्राप्ति कराने अथवा (परिधिः) शिल्पविद्या का धारण कराने वाला तथा (इडः) दाह प्रकाश आदि गुणवाला होने से स्तुति के योग्य (ईडितः) खोजा हुआ और (अग्निः) प्रत्यक्ष अग्नि (असि) है। [४]
- दसु — विद्वानों से (अस्य) इसका (नाभिः) मध्यभाग अर्थत् पीठ (पुरः) आगे (नीयते) प्राप्त की जाती अर्थात् उस पर बैठते हैं</span>, <span>उसको (पश्चात्) पीछे (रेभाः) सब विद्याओं की स्तुति करने वाले (कवयः) बुद्धिमान् जन (अनु</span>, <span>यन्ति) अनुकूलता से प्राप्त होते हैं। [५]
मेमेगु भाषे छ्येलिगु रुप
[सम्पादन]मेमेगु भाषे थ्व खँग्वयात छ्येलिगु रुप थ्व कथलं दु
- नेपाल भाषा :
- पालि :
- हिन्दी :
- खेँ भाषा :
- बांग्ला भाषा :
- मराठी भाषा :
- भोजपुरी भाषा :
- उडिया भाषा :
- गुजराती भाषा :
- मणिपुरी भाषा :
- रोमानी भाषा :
- पञ्जाबी भाषा :
- आसामी भाषा :
- मैथिली भाषा :
- द्रविड भाषात :
- मेमेगु भाषा:
स्वया दिसँ
[सम्पादन]पिनेयागु स्वापू
[सम्पादन]संस्कृत खँग्वसफू
(थ्व भाषा नाप स्वापू दुगु चीहाकगु च्वसु खः। थ्व च्वसुय् अप्व तथ्य तनादीत ईनाप दु।)
लिधंसा
[सम्पादन]- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ८
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ८
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ८
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः २/मन्त्रः ३
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः २९/मन्त्रः २३