प्राणवायु
Appearance
| प्राणवायु | |
| मू भाय् | संस्कृत |
प्राणवायु छगु संस्कृत भाषायागु खँग्वः खः। थ्व खँग्वःयागु छ्येलेज्या येक्व सफू व स्तोत्रय् जुगु दु।
खँग्वःयागु उत्पत्ति व छ्येलेज्या
[सम्पादन]उत्पत्ति व विकास
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या दक्ले न्ह्य संस्कृतय् जुगु ख। लिपा थ्व खँग्वयागु तत्सम खँग्वया रुपे यक्व भासे, यक्व कथलं छ्येलेज्या जुल।
छ्येलेज्या
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या संस्कृतय् व संस्कृत नाप स्वापू दुगु व संस्कृत नं बुया वगु भाषे जुगु खने दु।
- दसु — <p style="text-align: justify;"><strong>पदार्थः—</strong>हे (ब्रह्मणस्पते) जगदीश्वर! आपकी कृपा से (मित्रस्य) बाहर वा भीतर रहने वाला जो प्राणवायु तथा (अर्यम्णः) जो आकर्षण से पृथिवी आदि पदार्थों को धारण करने वाला सूर्य्यलोक और (वरुणस्य) जल (त्रीणाम्) इन तीनों के प्रकाश से (नः) हम लोगों के (द्युक्षम्) जिस में नीति का प्रकाश निवास करता है वा (दुराधर्षम्) अतिकष्ट से ग्रहण करने योग्य दृढ़ (महि) बड़े वेदविद्या की (अवः) रक्षा (अस्तु) हो। [१]
- दसु — तथा जो (ज्योतिः) बिजुलीरूप से शरीर वा ब्रह्माण्ड में रहने वाला अग्नि (वर्च्चः) विद्या और वृष्टि का हेतु है (सूर्यः) जो सब विद्याओं का प्रकाश करने वाला जगदीश्वर सब मनुष्यों के लिये (स्वाहा) वेदवाणी से (वर्च्चः) सकल विद्याओं का प्रकाश और (ज्योतिः) बिजुली</span>, <span>सूर्य प्रसिद्ध और अग्नि नाम के तेज का प्रकाश करता है तथा जो (सूर्यः) सूर्यलोक भी (वर्च्चः) शरीर और आत्माओं के बल का प्रकाश करता है तथा जो (सूर्यः) प्राणवायु (वर्च्चः) सकल विद्या के प्रकाश करने वाले ज्ञान को बढ़ाता है और (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप जगदीश्वर अच्छे प्रकार से हवन किये हुए पदार्थों को अपने रचे हुए पदार्थों में अपनी शक्ति से सर्वत्र फैलाता है</span>, <span>वही परमात्मा सब मनुष्यों का उपास्य देव और भौतिक अग्नि कार्य्यसिद्धि का साधन है। [२]
- दसु — अदितिर्द्यौरिति प्रकाशकारकोऽर्थो गृह्यते (असि) अस्ति (आदित्या) याऽऽदित्यवदर्थविद्याप्रकाशिकाऽष्टचत्वारिंशत् संवत्सरपर्यन्तानुष्ठितब्रह्मचर्य्यैः स्वीकृता सा (असि) अस्ति (रुद्रा) सा प्राणवायुसम्बन्धिनी चतुश्चत्वारिंशद्धायनावधिसेवितब्रह्मचर्यैः स्वीकृता सा (असि) अस्ति (चन्द्रा) आह्लादयित्री (असि) (बृहस्पतिः) परमेश्वरो विद्वान् वा (त्वा) ताम् (सुम्ने) सुखे (रम्णातु) रमयतु। [३]
- दसु — <p style="text-align: justify;"><strong>पदार्थः—</strong>हे विद्वन् मनुष्य! जैसे जो (वस्वी) अग्नि आदि विद्या सम्बन्धी, <span>जिसकी सेवा २४ चौबीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य करने वालों ने की हुई (असि) है</span>, <span>जो (अदितिः) प्रकाशकारक (असि) है</span>, <span>जो (रुद्रा) प्राणवायु सम्बन्ध वाली और जिसको ४४ चवालीस वर्ष ब्रह्मचर्य करनेहारे प्राप्त हुए हों</span>, <span>वैसी (असि) है</span>, <span>जो (आदित्या) सूर्य्यवत् सब विद्याओं का प्रकाश करने वाली</span>, <span>जिसका ग्रहण ४८ अड़तालीस वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्यसेवी मनुष्यों ने किया हो</span>, <span>वैसी (असि) है</span>, <span>जो (चन्द्रा) आह्लाद करने वाली (असि) है</span>, <span>जिसको (बृहस्पतिः) सर्वोत्तम (रुद्रः) दुष्टों को रुलाने वाला परमेश्वर वा विद्वान् (सुम्ने) सुख में (रम्णातु) रमणयुक्त करता और जिस (वसुभिः) पूर्णविद्यायुक्त मनुष्यों के साथ वर्त्तमान हुई वाणी वा बिजुली की (आचके) निर्माण वा इच्छा करता अथवा जिसकी मैं इच्छा करता हूं</span>, <span>वैसे तू भी (त्वा) उसको (रम्णातु) रमणयुक्त वा इसको सिद्ध करने की इच्छा कर। [४]
- दसु — <p style="text-align: justify;"><strong>पदार्थः—</strong>जो (वरुणः) अत्युत्तम, <span>परमेश्वर सूर्य्य वा प्राणवायु हैं</span>, <span>वे (वनेषु) किरण वा वनों के (अन्तरिक्षम्) आकाश को (विततान) विस्तारयुक्त किया वा करता (अर्वत्सु) अत्युत्तम वेगादि गुणयुक्त विद्युत् आदि पदार्थ और घोड़े आदि पशुओं में (वाजम्) वेग (उस्रियासु) गौओं में (पयः) दूध (हृत्सु) हृदयों में (क्रतुम्) प्रज्ञा वा कर्म (विक्षु) प्रजा में (अग्निम्) अग्नि (दिवि) प्रकाश में (सूर्य्यम्) आदित्य (अद्रौ) पर्वत वा मेघ में (सोमम्) सोमवल्ली आदि ओषधी और श्रेष्ठ रस को (अदधात्) धारण किया करते हैं</span>, <span>उसी ईश्वर की उपासना और उन्हीं दोनों का उपयोग करें। [५]
मेमेगु भाषे छ्येलिगु रुप
[सम्पादन]मेमेगु भाषे थ्व खँग्वयात छ्येलिगु रुप थ्व कथलं दु
- नेपाल भाषा :
- पालि :
- हिन्दी :
- खेँ भाषा :
- बांग्ला भाषा :
- मराठी भाषा :
- भोजपुरी भाषा :
- उडिया भाषा :
- गुजराती भाषा :
- मणिपुरी भाषा :
- रोमानी भाषा :
- पञ्जाबी भाषा :
- आसामी भाषा :
- मैथिली भाषा :
- द्रविड भाषात :
- मेमेगु भाषा:
स्वया दिसँ
[सम्पादन]पिनेयागु स्वापू
[सम्पादन]संस्कृत खँग्वसफू
(थ्व भाषा नाप स्वापू दुगु चीहाकगु च्वसु खः। थ्व च्वसुय् अप्व तथ्य तनादीत ईनाप दु।)
लिधंसा
[सम्पादन]- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः ३/मन्त्रः ३१
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः ३/मन्त्रः ९
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः ४/मन्त्रः २१
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः ४/मन्त्रः २१
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः ४/मन्त्रः ३१