पराक्रम
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| पराक्रम | |
| मू भाय् | संस्कृत |
पराक्रम छगु संस्कृत भाषायागु खँग्वः खः। थ्व खँग्वःयागु छ्येलेज्या येक्व सफू व स्तोत्रय् जुगु दु।
खँग्वःयागु उत्पत्ति व छ्येलेज्या
[सम्पादन]उत्पत्ति व विकास
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या दक्ले न्ह्य संस्कृतय् जुगु ख। लिपा थ्व खँग्वयागु तत्सम खँग्वया रुपे यक्व भासे, यक्व कथलं छ्येलेज्या जुल।
छ्येलेज्या
[सम्पादन]थ्व खँग्वयागु छ्येलेज्या संस्कृतय् व संस्कृत नाप स्वापू दुगु व संस्कृत नं बुया वगु भाषे जुगु खने दु।
- दसु — २३) अनेन विषेः पः प्रत्ययः (असि) अस्ति वा (उर्ज्जे) अन्नाय रसाय पराक्रमाय च (त्वा) त्वां तं वा (अदब्धेन) सुखयुक्तेन (त्वा) त्वां तं वा (चक्षुषा) विज्ञानेन प्रत्यक्षप्रमाणेन नेत्रेण (अव) क्रियार्थे। [१]
- दसु — तथा चायं यज्ञः प्रतिमन्त्रेण सम्यगनुष्ठितः सर्वप्राणिभ्यः प्रतिवस्तुषु पराक्रमबलप्राप्तये भवतीति। [२]
- दसु — पदार्थः— हे जगदीश्वर! जो आप (अदित्यै) पृथिवी के (रास्ना) रस आदि पदार्थों के उत्पन्न करने वाले (असि) हैं, (विष्णोः) व्यापक (वेष्पः) पृथिवी आदि सब पदार्थों में प्रवर्त्तमान भी (असि) हैं तथा (अग्नेः) भौतिक अग्नि के (जिह्वा) जीभरूप (असि) हैं वा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (धाम्ने धाम्ने) जिनमें कि वे विद्वान् सुखरूप पदार्थों को प्राप्त होते हैं, जो तीनों धाम अर्थात् स्थान, नाम और जन्म हैं, उन धामों की प्राप्ति के तथा (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र का आशय प्रकाशित होने के लिये (सूहूः) जो श्रेष्ठता से स्तुति करने के योग्य है, इस प्रकार के (त्वा) आप को मैं (अदब्धेन) प्रेमसुखयुक्त (चक्षुषा) विज्ञान से (ऊर्ज्जे) पराक्रम (अदित्यै) पृथिवी तथा (देवेभ्यः) श्रेष्ठ गुणों वा (धाम्ने धाम्ने) स्थान, नाम और जन्म आदि पदार्थों की प्राप्ति तथा (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र के आशय जानने के लिये [(त्वा) आपको] (अवपश्यामि) ज्ञानरूपी नेत्रों से देखता हूँ, आप भी कृपा करके [मे] मुझको विदित और मेरे पूजन को प्राप्त (भव) हूजिये। [३]
- दसु — जिस कारण यह यज्ञ (अदित्यै) अन्तरिक्ष के सम्बन्धी (रास्ना) रसादि पदार्थों की क्रिया का कारण (असि) है, (विष्णोः) यज्ञसम्बन्धी कार्य्यों का (वेष्पः) व्यापक (असि) है, (अग्नेः) भौतिक अग्नि का (जिह्वा) जिह्वारूप (असि) है, (देवेभ्यः) तथा दिव्य गुण (धाम्ने धाम्ने) कीर्ति, स्थान और जन्म इनकी प्राप्ति वा [मे] मेरे लिये (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र का आशय जानने के लिये (सुहूः) अच्छी प्रकार प्रशंसा करने योग्य (भव) होता है, इस कारण (त्वा) उस यज्ञ को मैं (अदब्धेन) सुखपूर्वक (चक्षुषा) प्रत्यक्ष प्रमाण के साथ नेत्रों से (अवपश्यामि) देखता हूँ तथा (त्वा) उसे (अदित्यै) पृथिवी आदि पदार्थ (देवेभ्यः) उत्तम-उत्तम गुण [(ऊर्जे) पराक्रम] (धाम्ने धाम्ने) स्थान-स्थान तथा (यजुषे यजुषे) यजुर्वेद के मन्त्र-मन्त्र से हित होने के लिये (अवपश्यामि) क्रिया की कुशलता से देखता हूँ। [४]
- दसु — सब मनुष्यों को जैसे यह जगदीश्वर वस्तु-वस्तु में स्थित तथा वेद के मन्त्र-मन्त्र में प्रतिपादित और सेवा करने योग्य है, वैसे ही यह यज्ञ वेद के प्रति मन्त्र से अच्छी प्रकार सिद्ध प्रतिपादित विद्वानों ने सेवित किया हुआ, सब प्राणियों के लिये पदार्थ-पदार्थ में पराक्रम और बल के पहुंचाने के योग्य होता है। [५]
मेमेगु भाषे छ्येलिगु रुप
[सम्पादन]मेमेगु भाषे थ्व खँग्वयात छ्येलिगु रुप थ्व कथलं दु
- नेपाल भाषा :
- पालि :
- हिन्दी :
- खेँ भाषा :
- बांग्ला भाषा :
- मराठी भाषा :
- भोजपुरी भाषा :
- उडिया भाषा :
- गुजराती भाषा :
- मणिपुरी भाषा :
- रोमानी भाषा :
- पञ्जाबी भाषा :
- आसामी भाषा :
- मैथिली भाषा :
- द्रविड भाषात :
- मेमेगु भाषा:
स्वया दिसँ
[सम्पादन]पिनेयागु स्वापू
[सम्पादन]संस्कृत खँग्वसफू
(थ्व भाषा नाप स्वापू दुगु चीहाकगु च्वसु खः। थ्व च्वसुय् अप्व तथ्य तनादीत ईनाप दु।)
लिधंसा
[सम्पादन]- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ३०
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ३०
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ३०
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ३०
- ↑ विकिस्रोतः – यजुर्वेदभाष्यम् (दयानन्दसरस्वतीविरचितम्)/अध्यायः १/मन्त्रः ३०